‘एकलव्य’ प्रणव धनावडे की कहानी के दूसरे पहलुओं को भी समझिए…

'Eklavya' Pranav dhanawade VS Arjun Tendulkar - The other side of story

पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया और टीवी चैनलों पर लगातार एक बहस चल रही है। अर्जुन तेंदुलकर बनाम प्रणव धनावडे। इस बहस को कोई सामाजिक संरचना की तरफ ले गया। किसी को उसमें अर्जुन और एकलव्य की कहानी दिखाई दी। कोई उसे अंबेडकर की सोच तक ले गया कि क्रिकेट अभिजात्य वर्ग का खेल है। भले ही सुनील गावस्कर से लेकर कपिल देव और सचिन तेंदुलकर से लेकर विराट कोहली तक कोई भी अभिजात्य वर्ग से ताल्लुक नहीं रखता है। लेकिन क्या करें, मसाला है। एक गरीब घर के बेटे पर अमीर घर के बेटे को तरजीह। इससे बेहतर क्या हो सकता है!

एक है ओपनर, दूसरा बॉलिंग ऑलराउंडर
लोगों ने एक बेसिक जानकारी पाना भी जरूरी नहीं समझा। क्रिकेट में एक सलामी बल्लेबाज की जगह सलामी बल्लेबाज, मिडिल ऑर्डर की जगह मिडिल ऑर्डर बैट्समैन, बॉलर की जगह बॉलर ले सकता है, ये किसी को बताने की जरूरत नहीं है। वैसे भी हमारा देश 100 करोड़ क्रिकेट एक्सपर्ट का देश है। जिन लोगों ने सोशल मीडिया पर अपने विचार व्यक्त किए या टीवी शो चला दिए, उन्होंने बताना जरूरी नहीं समझा कि अर्जुन तेंदुलकर बाएं हाथ के गेंदबाज हैं। ऐसा गेंदबाज, जो बल्लेबाजी कर सकता है। समझने के लिए मान लीजिए, इरफान पठान जैसा। दूसरी तरफ प्रणव धनावडे विकेटकीपर बल्लेबाज हैं। वो भी सलामी बल्लेबाज। किसी ने न तो समझने की कोशिश की और न ही समझाने की कि एक सलामी बल्लेबाज को बॉलिंग ऑलराउंडर की जगह नहीं मिल सकती।

अंडर 16 में कैसे खेलें, जब अंडर 16 हैं ही नहीं
दूसरा, मुझे नहीं पता कि जो लोग सवाल उठा रहे थे, उन्होंने आयु वर्ग वाले यानी अंडर 16 या अंडर 19 जैसे क्रिकेट के कितने मैच देखे होंगे। वे लोग मुझसे भी ये सवाल पूछ सकते हैं। मैंने भी टीवी पत्रकारिता शुरू करने के बाद शायद ही ऐसा कोई मैच देखा होगा। लेकिन उससे पहले काफी मैच देखे हैं। उनकी चयन प्रक्रिया को बहुत करीब से न सही, लेकिन देखा है। लोगों को यह जानना जरूरी है कि प्रणव धनावडे अंडर 16 नहीं हैं, क्योंकि उनका जन्म 1999 में हुआ था। सवाल उठाया जा सकता है कि जन्म तो अर्जुन का भी 1999 में हुआ था। यहां फर्क यह है कि अर्जुन अंडर 16 खेल रहे थे। मुंबई के लिए। पिछले सीजन में जो प्रदर्शन किया, उसके आधार पर उनका जोनल टीम के लिए चयन हुआ है। जबकि प्रणव धनावडे पिछले साल अंडर 16 नहीं खेल रहे थे। इसलिए वे 16 से ऊपर निकल जाने के बाद अंडर 16 टीम में चयन के पात्र नहीं हैं।

अंडर 19 कैंप का हिस्सा हैं प्रणव
तीसरा, जो लोग बता रहे हैं कि प्रणव को अनदेखा किया गया, वे जान लें कि ऐसा नहीं है। प्रणव धनावडे मुंबई में बाकायदा अंडर 19 समर कैंप का हिस्सा हैं। इन कैंप से 16 टीमें चुनी जाती हैं। दो दिनी मैच वहां होते हैं। प्रणव चार पारियां खेल चुके हैं। इनमें कुल 62 रन हैं। अधिकतम स्कोर 44 है। इस बात की पुष्टि उनके कोच ने की। जिन्हें चेक करना हो, वो 44 रन की पारी को एमसीए की वेबसाइट पर देख सकते हैं, जहां बाकायदा मैच में उनका नाम है। उन्होंने एक वनडे भी खेला है। वहां भी वे बड़ा स्कोर बनाने में नाकाम रहे।

क्या है दोनों में फर्क
द्रोणाचार्य, अर्जुन और एकलव्य की कहानियां सुनाने वाले लोग, क्रिकेट का फर्क समझ लें। अर्जुन बाकायदा मुंबई क्रिकेट का हिस्सा रहे हैं, जहां क्रिकेट ज्यादा ‘कॉम्पटीटिव’ होती है। प्रणव ठाणे से जुड़े हैं। यहां से आने वाले क्रिकेटर कम ही हैं। यकीनन बड़े घर से हैं, इसलिए अर्जुन के लिए सुविधाएं हैं। टीम इंडिया के पूर्व क्रिकेटर सुब्रत बनर्जी उनके कोच हैं। वसीम अकरम से वे टिप्स लेते हैं। लेकिन मुंबई क्रिकेट को जानने वाले आपको बताएंगे कि यहां स्कूली क्रिकेट के बड़े नामों को मदद करने वाले कभी कम नहीं रहे। सचिन जब आए थे, तब सुनील गावस्कर ने उनकी काफी मदद की थी। सचिन तेंदुलकर ने प्रणव धनावडे से हजार रन की पारी खेलने के बाद मुलाकात की थी, उन्हें बैट दिए, टिप्स दिए। मुंबई क्रिकेट की संस्कृति में यह है कि स्कूली क्रिकेट के बड़े नाम को दिग्गज क्रिकेटर मदद करते हैं। चाहे वह सोशल मीडिया की भाषा में ‘एकलव्य’ ही क्यों न हो।

क्या वाकई बड़े बाप के बेटे बड़े क्रिकेटर बन सकते हैं
अब वो सवाल, जिसका जवाब ढूंढना मुश्किल नहीं होगा। सबसे असरदार क्रिकेटरों में से एक सुनील गावस्कर हैं। क्या वे अपने बेटे रोहन गावस्कर को बड़ा क्रिकेटर बना पाए? एक किस्सा है, जिसकी सत्यता की पुष्टि नहीं की जा सकी। जब जगमोहन डालमिया सबसे पावरफुल थे और सौरव गांगुली भारतीय टीम के कप्तान थे। डालमिया ने गांगुली से कहा कि एक-दो मैच में रोहन को खिला लो। हम सब जानते हैं कि रोहन बंगाल से घरेलू क्रिकेट खेलते थे। सौरव ने सवाल पूछा कि क्या मैं सचिन को ड्रॉप करके खिला लूं? उसके बाद डालमिया ने रोहन के लिए फिर कभी नहीं कहा।

1971 के वेस्टइंडीज दौरे पर जहां गावस्कर का उदय हुआ था, तब सबसे बड़े बल्लेबाज के तौर पर दिलीप सरदेसाई थे। दिलीप सरदेसाई के बेटे राजदीप सरदेसाई भी क्रिकेटर बनना चाहते थे। लेकिन एक समय उन्हें समझ आया कि इतना टैलेंट नहीं है। वे पहले वकील और फिर पत्रकार बन गए। स्टुअर्ट बिन्नी पर जरूर रोजर बिन्नी का बेटा होने की वजह से फायदा मिलने का आरोप लगता है। लेकिन चेक जरूर कर लें कि स्टुअर्ट बिन्नी ने कितने साल घरेलू क्रिकेट खेली है। ..और क्या वे बड़ा क्रिकेटर बन पाए? आप मौके दिला सकते हैं, बड़ा क्रिकेटर नहीं बना सकते।

लाला अमरनाथ अपने तीन बेटों में सबसे शिद्दत से जिसे क्रिकेट खिलाना चाहते थे, वे राजिंदर अमरनाथ थे। लेकिन हम सब जानते हैं कि सबसे टैलेंटेड सुरिंदर अमरनाथ माना जाता है। सबसे सफल मोहिंदर अमरनाथ रहे थे। सौरव गांगुली को पहली बार डालमिया की मदद से टीम में जगह मिलने का आरोप लगता है। लेकिन उसके बाद उन्हें पांच साल मशक्कत करनी पड़ी। तभी वे टीम में आए, वह भी अपनी प्रतिभा के दम पर।

समझना जरूरी है कि ये खेल है, जहां मैदान पर आप अकेले होते हैं। कप्तान, चयनकर्ताओं और बोर्ड का साथ आपको बहुत समय तक छुपा नहीं सकता। अर्जुन को भी नहीं छुपा पाएगा, जो आखिरी बार अंडर 16 खेल रहे हैं। अब वे अंडर 19 खेलेंगे, तब उनकी सच्चाई सामने आ जाएगी। हो सकता है कि अर्जुन को उस ऑलराउंडर पर कुछेक बार तरजीह मिल जाए, जो गरीब घर से हो। यकीनन बड़े बाप का बेटा होने से सुविधाएं ज्यादा मिलती हैं। लेकिन एक सलामी बल्लेबाज पर तरजीह नहीं मिल सकती। 100 करोड़ क्रिकेट एक्सपर्ट के देश में इतनी छोटी सी बात तो हम सभी को पता होनी चाहिए…।

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शैलेश चतुर्वेदी – NDTV

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